Saturday, November 23, 2013

मप्र विधानसभा चुनाव - परिणाम का असमंजस अब उतना नहीं।



मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार का दौर अब ख़त्म हो गया है, सभी राजनीतिक दल अपने अपने तरीके से चुनाव में पूरी ताकत झोंक चुके हैं पर जैसा कि पहले से सम्भावित था, मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के ही बीच है। जहाँ भाजपा तीसरी बार सत्ता में आने के सपने देख रही है वहीँ कांग्रेस को अपने दस साल के वनवास को ख़त्म कर सत्ता में वापसी कि पूरी उम्मीद है।
इस बार का चुनाव दोनों ही दलों के लिए बहोत मायने रखता है क्योंकि भाजपा के लिए इस चुनाव कि जीत उसके मोदी के सम्बन्ध में लिए फैसले पर जनता कि मुहर कहलायेगी, वहीँ कांग्रेस के लिए ये जीत सत्ता में वापसी तो होगी ही साथ साथ २०१४ के लोकसभा चुनावों के लिए आइना भी होगी। कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए मुद्दे इस चुनाव में बड़ी समस्या रहे, क्योंकि जब जब कांग्रेस ने प्रदेश के भ्रष्टाचार कि बात कि तब तब उसे केंद्र कि कहानी याद आई जब जब भाजपा ने केंद्र के भ्रष्टाचार कि बात कि उसे अपने प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार भी याद था।  विकास कि दोनों कि अपनी अपनी परिभाषा देखने को मिली, शिवराज जिस विकास का गुणगान करते रहे हक़ीक़त में उनमे से अधिकतर योजनाये केंद्र सरकार कि थी जिसे नाम बदल कर प्रदेश में लागु लिया गया, वही कांग्रेस विकास कि बात करती जब भी दिखी मंहगाई ने उसके दम और दावे को उतनी मजबूती के साथ जनता के बीच नहीं आने दिया।  कांग्रेस जहाँ गुटबाजी से बाहर निकलकर अपने लक्ष्य कि ओर अग्रसर रही वहीँ भाजपा अपने मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर मौन रहकर विधायकों कि नाराजगी से सम्भावित नुकसान कि भरपाई में व्यस्त रही।  
सत्ता विरोधी लहर को भी इस बार नजर अन्दाज करना भाजपा के लिए इतना आसान नहीं था, वहीँ उमा भारती, प्रभात झा व जिन विधायकों, मंत्रियों के टिकट कटे एवं अन्य असंतुष्ट या साफ़ शब्दों में कहें तो शिवराज विरोधी लोगों ने भी भाजपा के प्रदेश सिंहासन को अस्थिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, और फिर अगर भाजपा इनका सामना कर भी ले जाये तो प्रदेश में नारी अपराध का बढ़ता ग्राफ, लचर क़ानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार से त्रस्त आम जनमानस इन्हें कितना माफ़ करता है देखना दिलचस्प होगा। पिछले पांच  वर्षों में मध्यप्रदेश में लोकायुक्त पुलिस ने भ्रष्टाचार के जितने मामले उजागर किये इतने देश के किसी अन्य प्रदेश में देखने को नहीं मिलते, इसे मुख्यमंत्री बेशक लोकायुक्त की सक्रियता या भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती के तौर पर देखते हों परन्तु हकीक़त केवल एक है की प्रदेश में नौकरशाही बलवान है व भ्रष्टाचार चरम पर है, अधिकारी कर्मचारी निरंकुश हैं और महत्वपूर्ण योजनायें लेनदेन की भेंट चढ़ रही है शायद विधानसभा चुनाव में भाजपा कि हार का ये बहोत बड़ा कारण बनेगा। 
मनरेगा में बगैर पूरी तैयारी के ई-एफएमएस लागू करके सरकार ने जिस तरह से योजना को बर्बाद किया है व गरीबों से दो वक़्त की रोटी के हक़ को छीना है उसे सरकार बेशक अपनी तकनीकी क्षमता के तौर पर देखती हो परन्तु गरीबों के लिए ये केवल मुह से निवाला छीनना जैसा था। 
ओपिनियन पोल के नतीजों ने आम जनता को कुछ भ्रमित, कांग्रेस को कुछ चिंतित और भाजपा के कार्यकर्ताओं को कुछ उत्साहवर्द्धित जरुर किया पर इससे भाजपा का शीर्ष नेतृत्व बिल्कुल भ्रमित नहीं हुआ क्योंकि  भाजपा के आंतरिक सर्वे के मुताबिक मध्य प्रदेश में पुनः सरकार बनाना बहोत मुश्किल था, भाजपा को अपने विधायकों कि संख्या १४३ से कम होकर १०१ होती दिख रही थी नतीजतन भाजपा ने बड़ी संख्या में अपने मौजूदा विधायकों यहाँ तक कि मंत्रियों के टिकट काटने का निर्णय लिया और अपने सर्वे से सबक लेने कि कोशिश की। 
भाजपा शायद अपने पिछले दो विधानसभा चुनाव के आकंड़ो से भी भयभीत थी मसलन अगर आप 2003 के विधानसभा चुनाव परिणाम पर गौर करें तो आप पाएंगे की भाजपा को कुल मतदान के  42.50 प्रतिशत वोट के साथ 173 सीटों पर सफलता प्राप्त हुयी थी वहीँ कांग्रेस को 31.70 प्रतिशत वोट के साथ केवल 38 सीटों की सफलता से समझौता करना पड़ा था लेकिन 2008 के विधानसभा चुनाव परिणाम पर अगर हम नजर डालें तो भाजपा का गिरता ग्राफ नजर आएगा, 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कुल मतदान के  38.09 प्रतिशत वोट के साथ 143 सीटों पर ही सफलता प्राप्त हुयी थी जो पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में वोट प्रतिशत में  4.41 प्रतिशत कम व सीटों की संख्या में  30 सीट कम है, वहीं कांग्रेस को 2008 के चुनाव में कुल मतदान का 32.85 प्रतिशत वोट के साथ 71 सीटों पर सफलता प्राप्त हुयी  जो पिछले विधानसभा के कांग्रेस के पक्ष में हुए मतदान प्रतिशत से 1.15 प्रतिशत अधिक और सीटों की संख्या में 33 सीटों का इजाफा है। इसके अतिरिक्त अगर हम 2008 में भाजपा को मिली 143 सीटों में जीत के अंतर को देखें तो भाजपा के 45 प्रत्याशियों ने  5000 से भी कम वोटों से अपनी जीत दर्ज की वहीँ 2000 से कम वोटों से जीतने वाले भाजपा प्रत्याशियों की संख्या 20 व 1000 से कम वोटो से जीतने वाले प्रत्याशियों की संख्या लगभग 13 थी।  
आंकड़े और सर्वे ही काफी थे भाजपा कि नींद उड़ाने के लिए पर बात यहीं जाकर नहीं रुकी, आरएसएस जो कि भाजपा कि पालक संस्था के नाम से जानी जाती है , ने भी मध्य प्रदेश में भाजपा कि स्थति को जानने के लिए एक सर्वे कराया और उसका आकलन इन सबसे ज्यादा अलग होते हुए भाजपा को बेहद संकट में दर्शा रहा था। 
वहीँ कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाते हुये मुख्यमंत्री पद के दावेदार कि अनौपचारिक घोषणा करके जनता के समक्ष एक सशक्त विकल्प प्रस्तुत कर दिया जो कांग्रेस कि छबि का पुनर्निर्धारण करने के लिए काफी था।  
पिछले दस साल से अकेले मैदान में ताल ठोक रही भाजपा को पसीने आ गए, अधिकतर मंत्री कांग्रेस कि टिकट बटवारे कि रणनीति का शिकार होकर अपने क्षेत्र में और अपनी सीट बचाने में ही व्यस्त रहे वहीँ कांग्रेस के सभी दिग्गज अपने अपने क्षेत्रों में अपने उम्मीदवारों के प्रति बढता जनसमर्थन देख उत्साहित होकर कार्य करते दिखे।  कांग्रेस कि टिकट बटवारे कि रणनीति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि सुरेश पचोरी जो कि अपने बेटे को टिकट दिलाना चाहते थे, खुद चनाव मैदान में आने को मजबूर हुये क्योंकि सवाल एक सीट का था और कांग्रेस सीटों कि संख्या में कोई समझौता नहीं चाहती थी।  
मध्य प्रदेश में मोदी का जादू कभी भी नहीं था और इस चुनाव में भी नहीं दिखा, मोदी के अप्रासंगिक भाषणो के चर्चे पूरे देश में थे सो जो उन्हें सुनने गया भी वो उनके सच और झूठ को परखने गया, इसके अतिरिक्त मीडिया पूरे देश को बता चुका था कि शिवराज आडवाणी गुट के हैं और मोदी आडवाणी के अरमानो को सीढ़ी बनाकर यहाँ आये हैं इसलिए शिवराज समर्थकों के सामने मोदी केवल स्वयंभू प्रधानमंत्री पद के दावेदार के सिवा कुछ नहीं थे। मोदी जिस गुजरात के विकास की चर्चा करते रहे उसी विकास को आडवाणी ने मध्य प्रदेश के विकाश के आगे कमजोर बताया था जो जनता और खासतौर पर भाजपा समर्थकों को भलीभांति मालूम है। प्रदेश कि जनता ने ये भी देखा कि मोदी २००२ के दंगों के दाग को साफ़ करने के लिए बेशक उपवास करते दिखें हों पर आगरा में मुजफ्फरपुर दंगों के आरोपियों को सम्मानित करके दंगों के समर्थन पर मुहर लगा बैठे।  मोदी शायद अपनी सभाओं में उमड़ती भीड़ को लेकर थोड़े खुस हुए भी हों पर गुजरात कैडर के आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा ने उनके ऊपर एक लड़की से नजदीकियों और उसकी जासूसी के आरोप लगा कर फिर उनके चरित्र का विचित्र चित्र प्रस्तुत कर दिया।  
नतीजा साफ़ था और है कि भाजपा अपने बुने जालों में उलझती चली गयी और कांग्रेस आगे बढ़ती चली गयी, आज के परिदृक्ष्य पर अगर नजर डालें तो कांग्रेस १२९ से १३३ सीट लेकर सरकार बनाती दिख रही है वही भाजपा ८० से ९० सीटों में सिमटती दिख रही है।

Saturday, August 3, 2013

भारतीय प्रशासनिक सेवा को लेकर शिवराज सरकार का दोहरा चरित्र

आज एक बार फिर भारतीय प्रशासनिक सेवा को लेकर शिवराज सरकार का दोहरा चरित्र सामने आया है जब एक राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को खुस करने या फिर यूँ कहें की राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी की राजनीतिक पहुँच के चलते सीधी भर्ती के भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी का स्थानांतरण महज १३ दिनों में इस लिए कर दिया गया क्योंकि जहाँ एक ओर  भ्रष्टाचारियों के मंसूबे नाकाम होते नजर आ रहे थे वहीँ भ्रष्टाचार का विरोध करने वाले कुछ लोग एक इमानदार कर्मठ अधिकारी के  साथ मिलकर विकास की एक नयी इबारत लिखने की तैयारी में थे जो आज के परिवेश में नदी में बहती जल धारा के विपरीत तैरने के प्रयास जैसा है। 
हैरानी तो तब होती है जब एक ओर भाजपा उत्तर प्रदेश कैडर की भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के पक्ष में नॉएडा में आन्दोलन कर विरोध जताती है और वहीँ दूसरी ओर  भाजपा अपने स्वशासी प्रदेश  मध्य प्रदेश में अकारण एक अधिकारी का १३ दिनों में स्थानांतरण कर अपनी शक्तियों के दुरूपयोग का उदहारण पेश करती है, पर मुद्दा यहीं पर आकर समाप्त नहीं हो जाता बल्कि अचम्भा तो तब और होता है जब इस स्थान पर पुनः उसी अधिकारी की नियुक्ति कर दी जाती जिसे ढाई वर्ष का कार्य काल पूरा करने के पश्चात महज १३ दिन पहले स्थानांतरित किया गया हो। 
इसमें कोई दो राय नहीं की अधिकारीयों की पदोन्नति और पदस्थापना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है पर इस अधिकार का उपयोग राज्य सरकार अपने निजी हित को साधने में नहीं बल्कि जनता के हित को ध्यान में रखकर किया करती है, ताकि प्रदेश में विकास हो, अमन चैन बना रहे, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण किया जा सके और शासन और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय बना रहे, पर सरकार ने इस बार निर्णय जनता के हित को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि एक अधिकारी की महत्वाकांक्षा को ध्यान में रखकर या यूँ कहें की अधिकारी ने अपनी राजनीतिक पहुँच साबित करने के लिए राज्य सरकार को अपने निर्णय को महज १३ दिन में बदलने के लिए विवश कर दिया और सरकार घुटनों के बल खड़े होकर बेशर्मी के अंदाज में खीसें निपोर रही है। 
सरकार को प्रदेश के आमजनमानस को बताना ही होगा की ऐसी कौन सी वजह थी की उक्त अधिकारी का जिले से स्थानांतरण किया गया और फिर ऐसी कौन सी अद्रश्य मजबूरियां सामने आई की सरकार अपने निर्णय पर कायम नहीं रह पाई, ये भी समझ से परे है की जिस अधिकारी को जिले से बाहर करना १३ दिन पहले एक प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा था, १३ दिन बाद वो प्रशासनिक व्यवस्था  ना जाने किस विवशता का शिकार हो गयी ओर कल जो इस दरवाजे से निकाले गए थे आज उसी के लिए दरवाजे न केवल खोले गए बल्कि तोड़ दिए गए और अब वो दिन दूर नहीं जब दीवारों को तोड़ने का काम इन्ही को दिया जाएगा अब वो दीवारें इमानदारी की हों या विकास की। 
सरकार का ये कदम साबित करता है कि स्थानांतरण और पदस्थापनाएं आज भी राजनीतिक दबदबा बनाने का एक जरिया है और अधिकारियों को अपने स्वार्थ की पूर्ती ना होने पर सजा के स्वरुप सरकार से मिलने वाला एक सबक, एक दंड और एक सन्देश है जो बड़े बड़े  आदर्शों और सिद्धांतों की बलि लेकर देश में अपेक्षित सुराज और सुशासन  की परिकल्पना को धूमिल करता है। 
मै बात कर रहा हूँ मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की जहाँ के जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री शिवनारायण सिंह चौहान का स्थानांतरण १३ दिन पहले अपर कलेक्टर रायसेन किया गया था और उनके स्थान पर सीधी भर्ती के आई ए एस अधिकारी श्री गणेश शंकर मिश्रा को बैतूल जिले की जिला पंचायत की कमान सौंपी गयी थी, श्री मिश्रा ने पदभार ग्रहण करने के बाद बैतूल जिले में जैसे ही विकास की एक नयी इबारत लिखने की कोशिश की, राज्य सरकार ने महज १३ दिन में इस कोशिश को शैशवावस्था में ही दफ़न कर दिया और दुबारा श्री शिवनारायण सिंह चौहान को बैतूल निजी संपत्ति की माफिक उपहार स्वरुप दे दिया।
जहाँ एक और श्री चौहान का अतीत अपने वरिष्ठों से अनुशासनहीनता और अपने कनिष्ठों को प्रताड़ित करने से शुरू होता है वहीँ उनकी इस स्तर की राजनीतिक पहुँच साबित करती है की राजनेताओं के लिए किसी अधिकारी का पक्ष लेने का कोई मापदंड नहीं है बल्कि ये सब मौका परस्त लोग हैं अपनी महत्वाकांक्षा और अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए किसी भी  स्तर तक गिर सकते हैं। श्री चौहान शाजापुर में चुनाव के दौरान गुजरात कैडर की महिला आई ए एस पर्यवेक्षक के साथ अभद्रता के मामले में जहाँ जांच का सामना कर रहे हैं वहीँ देवास के तत्कालीन कलेक्टर और जिला पंचायत के अध्यक्ष के साथ बदसलूकी करने की सजा के तौर पर सीधी स्थानांतरित हो चुके हैं पर फिर अपनी राजनीतिक पहुँच का लाभ लेकर बैतूल पहुँच गए थे और पुनः पहुँच गए है ये बहोत कुछ साबित करता है । 
श्री मिश्रा के ह्रदय की व्यथा इस वक़्त बहोत कुछ बयाँ करना  चाहती होगी पर एक इमानदार और कर्मठ आई ए एस अधिकारी जिसने अपनी शासकीय सेवा की शुरुआत महज २ वर्ष पहले की हो उसके लिए स्थानांतरण और पदस्थापना सरकार का विशेषाधिकार है और वो सरकार के इस निर्णय को शासकीय सेवा का एक अंग समझ कर स्वीकार भी कर लेंगे क्योंकि उन्हें अभी नहीं पता की राजनीतिक लोगों के लिए शासकीय सेवकों का   स्थानांतरण और उनकी पदस्थापना एक व्यवसाय है। 
मुझे नहीं मालूम की इस घटना के बाद श्री मिश्रा के मन में क्या चल रहा होगा पर मै इतना जरूर जानता हूँ की मानव स्वभाव प्रश्न करने का आदि है और इस वक़्त उनके मन में कई प्रश्न सरकार के लिए और उनके परिजनों के मन में कई प्रश्न उनके लिए होंगे जो जानना चाहेंगे की क्या मजबूरी है या क्यों लाचार है ये सरकार जो १३ दिन पहले मुझे जिस जिले के योग्य समझती थी वो महज १३ दिन भी अपने निर्णय पर कायम नहीं रह पायी।
मध्यप्रदेश भारतीय प्रशासनिक सेवा संघ नॉएडा की दुर्गा शक्ति नागपाल के तो साथ खड़ा है पर अपने ही प्रदेश के एक नवनियुक्त अधिकारी के हितों की रक्षा उसे सरकार का विरोध प्रतीत होती है शायद इसीलिए खामोश है। 
मै प्रदेश के मुखिया को बताना चाहता हूँ की प्रदेश की जनता इस स्थानांतरण के पीछे की हकीक़त जानती है और समझती है,अगर सरकार अपने इस निर्णय को वापस नहीं लेती है तो सरकार को अपनी वापसी का रास्ता देखना होगा, खूब सहा है, खूब बर्दाश्त किया है पर सहने और बर्दाश्त करने की एक सीमा है और उसके पार बगावत ।  पानी नाक तक भी हम सह लेंगे पर उसके ऊपर वही हाल होगा जो ९९ गालियों के बाद शिशुपाल का हुआ था।
 

Saturday, June 8, 2013

लोकतंत्र, नैतिकता और इस्तीफ़ा -

लोकतंत्र, नैतिकता और इस्तीफ़ा 

- अभय तिवारी 
09999999069
 

लोकतंत्र, नैतिकता और इस्तीफ़ा जैसे शब्द अब राजनीतिक शब्दावली  का पर्याय बन चुके हैं, हर राजनीतिक दल इन्ही शब्दों का उपयोग करके अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने में लगा हुआ  है जबकि हकीक़त ये है की ये शब्द अब नेताओ की कारगुजारी या साफ कहें काले कारनामों को छुपाने का बहोत बड़ा माध्यम बन चुके हैं हर कोई खुद को इनके दायरे से बाहर रखता है और दूसरों को इनके महत्व को बताने का प्रयास करता है, आम जनता भ्रमित होती है और बारी बारी से सब पर भरोसा करती है।
जिस भाजपा ने कुछ दिन पहले नैतिकता के आधार पर केंद्र सरकार से इस्तीफा - इस्तीफा खेलने की कोशिश की और सदन की कारवाही में व्यवधान उत्पन्न कर आम  जनता  के हितों को प्रभावित किया वही भाजपा बीसीसीआई और आईपीएल में नैतिकता भूल गयी, और भाजपा ही भर नहीं श्रीनिवासन के मुद्दे पर तमाम राजनीतिक दलों का जो रुख रहा है उससे तो यही साबित होता है की नैतिकता इन सभी के लिए एक पूँजी है जिसे जब जरुरत पड़ती है बेंचकर अपना काम चलाया जाता है। हर राजनीतिक दल को  नैतिकता केवल तब याद आती है जब विरोधी दल को कोसना होता है, ये नैतिकता कम और एक राजनीतिक हथियार ज्यादा नजर नजर आती है जिसका उपयोग हम आये दिन देखते है।
यूँ तो नैतिकता की परिभाषा सबको पता है पर राजनीती में इसकी कोई स्थायी परिभाषा नहीं है, छत्तीसगढ़ में राजनीतिक लोगों पर नक्सली हमला हुआ तो मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगने की वजह नैतिकता थी पर वहीँ कुछ दिन पहले जब सीआरपीफ के जवानों को निशाना बनाया गया तब शायद कांग्रेस को नैतिकता की याद नहीं आई, जवानों पर हमला महज एक नक्सली वारदात थी जिसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं था पर राजनीतिक लोगों पर हमला लोकतंत्र पर हमला माना गया और इसकी नैतिक जिम्मेदारी भी खोजने की पुरजोर कोशिश की गयी जिस पर तब विराम लगा जब एनआईए ने कांग्रेस के ही कुछ लोगों पर संदेह करना शुरू कर दिया।
मतलब साफ़ है की राजनीतिक दलों की मौका परस्ती आम जनमानस की समझ से परे है जिसका ये सब उपयोग करने की कोशिश करते है।


Wednesday, May 29, 2013

अब आसान नही भाजपा की जीत - Election 2013 in Madhya Pradesh

 

अब आसान नही भाजपा की जीत 

 
अभय तिवारी 
09999999069
 
                   आगामी विधानसभा चुनाओं में किस दल को बहुमत मिलेगा इसके कयास अभी से लोगों ने लगाना शुरू कर दिए हैं, जहाँ कांग्रेस गत वर्ष हुए विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव व हाल ही में संम्पन्न हुए कर्नाटक के चुनाव के साथ साथ मध्यप्रदेश के  स्थानीय निर्वाचन में मिली सफलता से उत्साहित है वही भाजपा अपने दागी मंत्रियों और निरंकुश प्रशाशन तंत्र की वजह से गिरती साख को बचाने का भरपूर प्रयास कर रही है।
 
                    भाजपा शायद अपने पिछले दो विधानसभा चुनाव के आकंड़ो से भी भयभीत है मसलन अगर आप 2003 के विधानसभा चुनाव परिणाम पर गौर करें तो आप पाएंगे की भाजपा को कुल मतदान के  42.50 प्रतिशत वोट के साथ 173 सीटों पर सफलता प्राप्त हुयी थी वहीँ कांग्रेस को 31.70 प्रतिशत वोट के साथ केवल 38 सीटों की सफलता से समझौता करना पड़ा था लेकिन 2008 के विधानसभा चुनाव परिणाम पर अगर हम नजर डालें तो भाजपा का गिरता ग्राफ नजर आएगा, 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कुल मतदान के  38.09 प्रतिशत वोट के साथ 143 सीटों पर ही सफलता प्राप्त हुयी थी जो पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में वोट प्रतिशत में  4.41 प्रतिशत कम व सीटों की संख्या में  30 सीट कम है, वहीं कांग्रेस को 2008 के चुनाव में कुल मतदान का 32.85 प्रतिशत वोट के साथ 71 सीटों पर सफलता प्राप्त हुयी  जो पिछले विधानसभा के कांग्रेस के पक्ष में हुए मतदान प्रतिशत से 1.15 प्रतिशत अधिक और सीटों की संख्या में 33 सीटों का इजाफा है।
 
                     इसके अतिरिक्त अगर हम 2008 में भाजपा को मिली 143 सीटों में जीत के अंतर को देखें तो भाजपा के 45 प्रत्याशियों ने  5000 से भी कम वोटों से अपनी जीत दर्ज की वहीँ 2000 से कम वोटों से जीतने वाले भाजपा प्रत्याशियों की संख्या 20 व 1000 से कम वोटो से जीतने वाले प्रत्याशियों की संख्या लगभग 13 हैं, ये आंकड़े मै केवल इसलिए रख रहा हूँ की आप अनुमान लगा सकें की कितनी सीटों पर भाजपा बेहद असुरक्षित है। वहीँ एक सर्वे के मुताबिक भाजपा के 8 वर्तमान मंत्रियों की जीत भी लगभग नामुमकिन सी है इस अनुसार भाजपा की सीटों की संख्या 143 से कम  होकर मात्र 90 तक ही पहुँच सकती है, पर आंकड़े अभी और भी हैं जो भाजपा को सकते में डालने के लिए काफी हैं।
 
                       सत्ता विरोधी लहर को भी इस बार नजर अन्दाज करना भाजपा के लिए इतना आसान नहीं है, वहीँ उमा भारती, प्रभात झा जैसे अनेक असंतुष्ट या साफ़ शब्दों में कहें तो शिवराज विरोधी लोग भी भाजपा के प्रदेश सिंहासन को अस्थिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, और फिर अगर भाजपा इनका सामना कर भी ले जाये तो प्रदेश में नारी अपराध का बढ़ता ग्राफ, लचर क़ानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार से त्रस्त आम जनमानस इन्हें कितना माफ़ करता है देखना दिलचस्प होगा।
                         पिछले पांच  वर्षों में मध्यप्रदेश में लोकायुक्त पुलिस ने भ्रष्टाचार के जितने मामले उजागर किये इतने देश के किसी अन्य प्रदेश में देखने को नहीं मिलते, इसे मुख्यमंत्री बेशक लोकायुक्त की सक्रियता या भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती के तौर पर देखते हों परन्तु हकीक़त केवल एक है की प्रदेश में नौकरशाही बलवान है व भ्रष्टाचार चरम पर है, अधिकारी कर्मचारी निरंकुश हैं और महत्वपूर्ण योजनायें लेनदेन की भेंट चढ़ रही है शायद विधानसभा चुनाव में ये भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरेगा।
                           मनरेगा में बगैर पूरी तैयारी के ई-एफएमएस लागू करके सरकार ने जिस तरह से योजना को बर्बाद किया है व गरीबों से दो वक़्त की रोटी के हक़ को छीना है उसे सरकार बेशक अपनी तकनीकी क्षमता के तौर पर देखती हो परन्तु अगर कांग्रेस  ई-एफएमएस के पीछे छुपी भाजपा की राजनीतिक मंसा को आम जनता को बताने में कामयाब हो जाती है तो शायद भाजपा को उस पराजय का मुह देखना पड़ सकता है जिसकी कल्पना तक भाजपा ने नहीं की होगी।
 
 
 
 


Friday, May 24, 2013

मनरेगा में ई-एफएमएस - योजना मूल उद्देश्य से भटकी E-fms In MGNREGA

मनरेगा में ई-एफएमएस - योजना मूल उद्देश्य से भटकी

- अभय तिवारी

 
             केंद्र सरकार की बहुचर्चित योजना महात्मा गाँधी राष्टीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जॉबकार्ड धारी परिवार को सौ दिवस का रोजगार उपलब्ध  कराने  के अपने मूल उद्देश्य से भटकती जा रही है और उसका कारण योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने के लिए उठाये जा रहे अदूरदर्शी कदम है जिसका एक नमूना ई-एफएमएस  भी है।
             सरकार इस योजना में भ्रष्टाचार की रोज मिलती शिकायतों से इस कदर परेशान हो चुकी थी की भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए ऐसे प्रयोग कर बैठी जिससे भ्रष्टाचार पर कितना नियंत्रण होगा ये तो अभी महज एक कल्पना बनी हुयी है पर योजना के क्रियान्वयन पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभाव अभी से नजर आने लगे हैं। जहाँ लेबर बजट के अनुसार मई माह तक कुल 22271465 मानव दिवस का सृजन किया जाना था वहीँ आधी अधूरी तैयारी के साथ ई-एफएमएस  लागू करने के फलस्वरूप केवल 795825 मानव दिवस सृजित किया जा सका है जो निर्धारित लक्ष्य का मात्र 3.57  प्रतिशत है। वहीँ दूसरी ओर अगर हम योजना पर व्यय की बात करें तो लेबर बजट के मान से मई माह तक 57004.91 लाख का व्यय अनुमानित था परन्तु  ई-एफएमएस  की वजह से आ रही परेशानियों का नतीजा यह निकला की हम मई माह तक कुल 1806.71 लाख का ही व्यय योजना क्रियान्वयन पर कर पाए जो निर्धारित लक्ष्य का मात्र 3.10 प्रतिशत है। इसके अतिरिक्त योजना को पारदर्शी बनाने के लिए भारत सरकार द्वारा निर्मित एम आई एस सॉफ्टवेर में प्रदर्शित आंकड़े भी गलत प्रतीत होते हैं जैसे अगर हम श्रम और सामग्री के अनुपात की बात करें तो कुल व्यय का 1463.03 लाख श्रम में व्यय दर्शाया जा रहा है जो कुल व्यय का 84.78 प्रतिशत है और सामग्री में कुल व्यय 262.73 है जो कुल व्यय का 15.22 प्रतिशत है, यदि  श्रम  और  सामग्री  का  ये  अनुपात  पिछले वित्तीय वर्ष में होता तो  शायद  मध्यप्रदेश  इस  योजना  के  बेहतरीन  क्रियान्वन करने वाले राज्यों में प्रथम  स्थान  पर होता   परन्तु  ये  आकडे वित्तीय वर्ष 2013-2014 के हैं और सामग्री में व्यय इसलिए कम नहीं प्रदर्शित हो रहा है की श्रम प्रधान कार्य किये जा रहे हैं बल्कि सामग्री में व्यय कम प्रदर्शित होने का कारन भी  ई-एफएमएस  ही है जिसकी अनिवार्यता की वजह से सामग्री के भुगतान में तकनीकी समस्या आ रही है और जिसके जल्द निराकरण की दूर दूर तक कोई तस्वीर भी नजर नहीं आती।
              आप ये जानकार हैरान होंगे की मनरेगा कर्मियों का वेतन भी  ई-एफएमएस  की वजह से लम्बे समय से जारी नहीं हो पाया है वजह फिर वही है की बगैर संपूर्ण तकनीकी संसाधनों के  ई-एफएमएस  को लागू करना। आज भी प्रशासनिक व्यय के लिए  ई-एफएमएस  में कोई प्रावधान नहीं है, ऐसे में प्रश्न उठता है की राज्य सरकार को  ई-एफएमएस  व्यवस्था को लागू करने की ऐसी भी क्या जल्दी थी की एक सुविधा समूचे प्रदेश के मजदूरों, सामग्री प्रदाताओं व योजना से जुड़े कर्मियों के लिए सबसे बड़ी  असुविधा बन चुकी है।
             योजना के अंतर्गत मुख्यतः तीन तरह के भुगतान किये जाते हैं, मजदूरी का भुगतान, सामग्री का भुगतान व प्रशासनिक व्यय जिसके अंतर्गत मनरेगा कर्मियों के वेतन से लेकर योजना क्रियान्वयन के लिए आवश्यक अन्य व्यय शामिल हैं। जब राज्य सरकार के पास सामग्री और प्रशासनिक व्यय का  ई-एफएमएस  से भुगतान करने की पूर्ण तैयारी नहीं थी तब भुगतान के इस माध्यम को अपनाना और चेक जारी करने पर प्रतिबन्ध लगाना कितना उचित था।  
              मेरी बातों का आप ये अर्थ मत लगाइए की सामग्री का भुगतान व प्रशासनिक व्यय के लिए नहीं पर मजदूरी का भुगतान  ई-एफएमएस  के माध्यम से करने के लिए सरकार पूरी तरह से तैयार थी, नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है।  ई-एफएमएस  के माध्यम से उन्ही श्रमिको को भुगतान किया जा सकता है जिनका बैंक खाता भुगतान हेतु फ्रीज किया गया हो और वर्तमान में कुल पंजीकृत 38469457 श्रमिको में से केवल 1749877 श्रमिकों के ही बैंक खाते फ्रीज़ हो पाए हैं जो निर्धारित लक्ष्य का मात्र 4.5 प्रतिशत है, अर्थात मध्यप्रदेश सरकार वर्तमान में  ई-एफएमएस  के माध्यम से  केवल 4.5 प्रतिशत श्रमिकों का ही भुगतान कर सकती है। आकड़ों से स्पष्ट है की राज्य सरकार की  ई-एफएमएस  लागू करने के पूर्व की तैयारियां लगभग शून्य थी ऐसे में सरकार को किसी भी नयी व्यवस्था को लागू करने से पहले योजना के मूल उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए था, हमारे पास भ्रष्टाचार को रोकने के लिए विभिन्न तरह की जांच एजेंसियां थी जिन्हें इसपर और मजबूती से काम करने के लिए बाध्य किया जा सकता था ना की लोगों को रोजगार की ग्यारंटी देने वाली योजना से रोजगार देने का काम बंद करना चाहिए था।
               आज आप किसी भी जनपद या जिला पंचायत कार्यालय जाकर अगर लोगों की  ई-एफएमएस  के बारे में  राय लेंगे तो हर अधिकारी और कर्मचारी एक सुर में इसे गलत करार देता नजर आयेगा परन्तु आज तक किसी भी जिले से किसी भी स्तर के अधिकारी ने  ई-एफएमएस  से योजना को हो रहे नुकसान से सरकार को अवगत नहीं कराया उसका मुख्य कारण ये था की जो भी  ई-एफएमएस  व्यवस्था के खिलाफ बोलेगा उसे भ्रष्टाचार का समर्थक माना जायेगा। आज मनरेगा से जुड़े हर अधिकारी और कर्मचारी के लिए  ई-एफएमएस  का समर्थन करना खुद को सबसे बड़ा इमानदार साबित करने का एक और एक मात्र रास्ता बचा है, समझ नहीं आता हर अधिकारी और कर्मचारी  ई-एफएमएस  का समर्थक और भ्रष्टाचार का विरोधी है तो फिर ये भ्रष्टाचार कर कौन रहा था।
            शायद सरकार  ई-एफएमएस  लागू करके प्रदेश को उच्च तकनीकी क्षमताओं वाले राज्यों में शामिल करना चाहती होगी पर यदि ऐसा है भी तो इन्हें केवल वही योजना नजर आई जिससे गरीब मजदूरों को दो वक़्त की रोटी नसीब होती है, क्या सरकार की अन्य योजनाओं में भ्रष्टाचार नहीं है जो इस तरह के प्रयोग वहां नहीं किये गए, या इस तरह के प्रयोग वहां नहीं किये गए जहाँ हितग्राही मध्यम या उच्च वर्गीय परिवार थे,  ई-एफएमएस  के पीछे की मंसा को भी गहराई से समझना और समझाना जरूरी है वर्ना वो दिन दूर नहीं जब गरीबों को रोटियां भी कंप्यूटर की स्क्रीन पर दिखाई जाएगी।
            चलिए अब  ई-एफएमएस  को राष्टीय स्तर पर देखते हैं, आप अचंभित हो जायेंगे की केवल मध्य प्रदेश ने ही अपने सभी जिलों में ये व्यवस्था लागू करके योजना को समाप्त किया है जबकि शतप्रतिशत साक्षर प्रदेश केरल में केवल 5 जिलों में, देश में सर्व प्रथम ई-गवर्नेंस को लागू करने और कंप्यूटर का शासकीय कार्यों में अधिकतम उपयोग करने वाले राज्य आँध्रप्रदेश में केवल 4 जिलों में, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में केवल 18 जिलों में और मध्यप्रदेश के विभाजित तथा भाजपा शासित छत्तीसगढ़ के केवल एक जिले में  ई-एफएमएस  व्यवस्था लागू है फिर मध्यप्रदेश को 48 जिलों में ये असफल प्रयोग करने की क्या सूझी होगी, जबकि हकीक़त ये है की जिन राज्यों का उदहारण दिया गया है ये  ई-एफएमएस  व्यवस्था लागू करने में मध्यप्रदेश से ज्यादा सक्षम थे परन्तु उन्होंने इसे केवल इस लिए लागू नहीं किया क्योंकि वो जानते थे कि  ई-एफएमएस  को लागू करने में आने वाली व्यवहारिक कठिनाईयां मजदूर से दो वक़्त की रोटी का हक भी छीन लेगी।
            देश में जितने भी बड़े निर्माण हुए हैं वो शायद इसीलिए संभव हो पाए की वहां  ई-एफएमएस  की प्राथमिकता से ज्यादा निर्माण की प्राथमिकता थी, अगर वहां भी  ई-एफएमएस  जैसी परिकल्पना कर ली जाती तो शायद हमें मैट्रो रेल, फ्लाई ओवर, उच्च स्तरीय सड़के, बड़े बड़े ब्रिज और अक्षरधाम जैसे भव्य मंदिर के निर्माण की केवल शुरुआत ही देखने का अवसर मिल पाता। आज तक सुना था कि कंप्यूटर जैसी तकनीक का उपयोग करके हम अपने कार्यों को तीव्रता दे सकते है और अपेक्षा से ज्यादा अच्छे परिणाम पा सकते हैं पर पहली बार ये देखने में आ रहा है की चंद लोगों की अदूरदर्शी सोच कैसे वरदान को अभिशाप में बदल सकती है। वो ग्रामीण लोग जो कंप्यूटर को एक जादू मानते थे अब उन्हें यकीन हो गया की ये सच में एक जादू ही है जिसने लोगों की थाली से रोटी गायब कर दी।
              शायद सरकार ये सोचती है की गाँव का गरीब   ई-एफएमएस  के पूरी तरह क्रियाशील होने का  इन्तेजार करेगा जबकि हकीक़त ये है की या तो वो प्रदेश से पलायन करेगा या फिर पैसा कमाने के अन्य रास्तो की ओर नजर ले जायेगा जिसमे अपराध भी शामिल होगा, फिर शायद हम  ई-एफएमएस  में सफल हो भी जाएँ तो क्या हम अपने नैतिक मूल्यों को खोकर आने वाले भारत के निर्माण की कल्पना करेंगे और निर्मित भारत कितना भयावह होगा इसकी परिकल्पना शायद हम अभी कर ही नहीं सकते।
           अविश्वास किस पर किया जा रहा है ये तो अभी नहीं मालूम पर  ई-एफएमएस  की आवश्यकता से तो यही जान पड़ता है की सरकार भ्रष्टाचार के लिए पूरी तरह से उस पंचायत सचिव को जिम्मेदार मान रही है जिसके बगैर इस योजना का क्रियान्वयन अकल्पनीय है।  
             चुनावी वर्ष में इतना गलत कदम किसी सोची समझी रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है क्योंकि ये कदम चुनाव के नतीजों को प्रभावित करेगा परन्तु इसका लाभ  भाजपा को मिलेगा या कांग्रेस को इस बारे में मत भिन्न भिन्न हो सकते हैं पर इसका नुक्सान आम जनता भुगतेगी इस बारे में कोई मतभेद नहीं हैं।
 


Friday, March 15, 2013

Jindgi ko Jaisa Maine dekhs - जिन्दगी को जैसा मैंने देखा

हम सब मानव स्वरुप में इस प्रथ्वी के सबसे मूल्यवान तत्व हैं और जानते हैं की जीवन अजर, अमर,  और अविनाशी नहीं है बल्कि कोई भी शाम हमारी जिन्दगी की आखरी शाम हो सकती है, हमें इस सत्य का भी अहसास है कि  हम जिनके आसपास रहते है या जिनके साथ रहते हैं सब बारी बारी से अलग होते चले जायेंगे और दुनिया फिर भी यूँ ही चलती रहेगी, शायद जन्म और म्रत्यु कि यथार्थता के बीच के  भंवर को ही हम जीवन मानते हैं  जबकि सच्चाई ये है की जन्म और म्रत्यु के अलावा बाकि सब उस द्रश्य की तरह है जो हमारे जाने के बाद अद्रश्य हो  जायेगा और  केवल जन्म  और मर्त्यु कि यथार्थता ही शेष बचेगी |

Thursday, March 14, 2013

kitna Badal Gaya Insan - कितना बदल गया इंसान

परिवर्तन और व्यापर  कि ऐसी बयार चली है की इंसान और इंसानियत भी इससे नहीं बच सकी, इंसान चंद रुपयों की जरुरत के लिए इतना  बदल गया कि उसे अपना धरम और ईमान भी सरेबाजार नीलाम करने में कोई परहेज नहीं रहा, आज आलम ये है की आदमी अपने अस्तित्व और वजूद को साबित करने के लिए या अपने थोड़े से स्वार्थ की पूर्ती के लिए किसी का कितना भी बड़ा नुकसान करने से पीछे नहीं हटता बल्कि उसे दूसरों को प्रताड़ित करने में आनंद की अनुभूति होती है । शायद आज के इंसान को ये लगता है कि  उनकी उन्नति दूसरों की अवनती पर निर्भर है यही कारन है की वो दूसरों को असफल कर अपनी सफलता का मार्ग खोजता है । 
छोटी सी जिंदगी है, वो भी आज है पर कल का कोई ठिकाना नहीं, फिर  हम इसे आपसी सौहार्द और प्रेम के साथ क्यों नहीं बिता सकते, क्यों नहीं हम लोगों की ख़ुशी और मुस्कराहट का कारक बन सकते, क्यों नहीं हम आपसी मतभेदों और मनभेदों को दूर कर अपने आस पास खुशहाली का वातावरण तैयार कर सकते ...... शायद इसलिए कि हमारा मन और मस्तिष्क अब स्वाभिमानी नहीं अभिमानी हो चुका है, हम कुछ हासिल करने के नाम पर बहोत कुछ खो चुके हैं, हम जितनी उच्च स्थति को हासिल कर रहे हैं उतनी ही निम्नता और संकीर्णता हमारे ह्रदय में समाती जा रही है, पैसा अब हमारी जरुरत नहीं बल्कि हमारे अभिमान का कारक बन चुका है, अब घरों पर केवल  नाम और ओहदे बचे है इंसान और इंसानियत पद और प्रतिष्ठा के दांवपेंच में कहीं दफ़न हो चुकी है ।
हमें याद रखना चाहिए कि हमारे कर्म ही हमारी सफलता का निर्धारण कर सकते हैं, अगर हम सोचते है की किसी को परेशान करके हम चैन से जी पाएंगे तो ये हमारी गलत फहमी है क्योंकि अगर हम किसी के साथ बुरा करने का प्रयास करते हैं तो इश्वर हमारे साथ भी बुरा करने वाला कहीं ना कहीं तैयार रखता है और वक़्त आते ही हमें हमारे कर्मों का फल मिल जाता है।  

Thursday, November 22, 2012

Saare Jahan Se Achha - सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा है .........

जहाँ सुरक्षाकर्मी जब जिसको चाहे कर दे अँधा
और पुलिस के थाने ऐसे जैसे पंडों का धंधा
मुठभेड़ों के नाम पर हत्या होती है निर्दोषों की
चौराहों की मर्यादा है ठोकर में मदहोशों की
जहाँ वर्दियों की बाहों में अबला की चीखें गम है
गाँधी की नैतिकता वाली आँखों के आगे तम है
भारत गाँधी के सपनों का कातिल है हत्यारा है
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा है .........

गर्मी सर्दी बरसातों में निर्धन मर जाएँ तो क्या
आमों की गुठली के आटे की रोटी खाएं तो क्या
आदिवासियों की मजबूरी पेड़ों की पत्ती खाएं
झोपड़ियों में पैदा होकर फुटपाथों पर मर जाएँ
हमने अपनी झोपड़ियों के आँगन भूख सहेजी है
लेकिन अपनी कला नाचने अमरीका में भेजी है
जो भूखों से भीख मांग ले भारत वो बंजारा है
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा है .........

खूनी दंगों के जंगल ही जंगल जिसके आँगन में
लाखों चोटें खाए बैठा है जो अपने दामन में
जिसके पूजा घर शामिल हैं होड़ों में हथियारों की
ईटें भी रोती होंगी मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों की
जिसका रोज तिरंगा अपने लहू में सन जाता है
बेटे का पिस्तौल माँ के ही सीने पर तन जाता है
भगत सिंह की धरती पर खालिस्तानी नारा है
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा है .........

कफ़न खसौटे भी हमसे बेशर्मी में हार गए
भारत के मुर्दे भी बिक बिक कर सीमा पार गए
हमने आडम्बर ओढा है धरम करम के सायों का
पर दुनिया वालों के आगे मांस परोसा गायों का
यहाँ पुजारी भी बैठे हैं आँखों में नाख़ून लिए
और ब्रह्मचारी फिरते हैं जेबों में कानून लिए
राम तुम्हारी गंगा मैली गंगा जल भी खारा है
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा है .........

जहाँ अभी भी मानव की बलि रोज चढ़ाई जाती है
पत्थर की मूरत भी लहू से नहलाई जाती है
युवा कली की घूघट उठने से पहले सिल जाती है
इस भारत में दूध नहीं मिलता मदिरा मिल जाती है
जहाँ रोज लाशें बनती हैं दुल्हन बिना दहेजों की
और रोज संख्या बढ़ जाती है आवारा सेजों की
बेबस नोची हुयी कली का चकला यहाँ सहारा है
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा है .........

यहाँ बुद्धि तौली जाती है जाती सने आधारों से
सत्ता की नैया चलती है आरक्षित पतवारों से
कूटनीतियाँ तोड़ रही हैं निर्धन की खुद्दारी को
यहाँ परीक्षा से पहले परिणाम सुरक्षित होता है
मिट्टी के माधव का भी सम्मान सुरक्षित होता है
आरक्षण कानून वतन की प्रतिभा का हत्यारा है
फिर भी सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा है .........

Monday, November 19, 2012

Indian Democracy vs Anna, Kejriwal and .....

देश में परिवर्तन की लहर चल रही है, देश का आमजनमानस खुद को छोड़ बाकि सब कुछ बदलना चाहता है, जो अपने हालात न बदल पा रहा हों वो भी देश को बदलने की कोशिश में है, या यूँ कहिये की हम अपने वर्तमान पर अविश्वास करने लगे हैं और असुरक्षा की भावना का शिकार हो रहे हैं। अविश्वास और असंतोष का आलम ये है की हम ये भी नहीं सोचना चाहते की ये परिवर्तन हमें सकारात्मक दिशा की ओर ले जायेगा या फिर हम अपने वजूद को भी खो देंगे। इस परिवर्तन का हर कोई अपने तरीके से लाभ लेने की जुगत में लगा हुआ है, राजनीतिक दल इसे सत्ता पक्ष के खिलाफ माहौल समझ रहे हैं और अपने पक्ष में वोट बैंक में तब्दील करना चाहते हैं, दूसरी ओर  समाज सेवा के रास्ते कुछ लोग अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए मुख्यधारा में शामिल होकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।
अन्ना और केजरीवाल इसका बड़ा उदाहरण हैं, ये जनमत पर भरोसा नहीं करते, चुनी हुयी सरकार पर भरोसा नहीं करते, लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर भरोसा नहीं करते, हमारी न्यायायिक व्यवस्था पर भरोसा नहीं करते, देश में मौजूद जांच एजेंसी पर भरोसा नहीं करते, किसी भी राजनीतिक दल पर भरोसा नहीं करते, उद्योग घरानों पर भरोसा नहीं करते और चाहते हैं देश की एक अरब से भी ज्यादा जनसंख्या इन पर भरोसा करे, उन जनप्रतिनिधियों का मजाक उड़ाते हैं जिन्हें देश के आवाम ने मतदान कर चुना है और खुद को देश का मसीहा बताने की कोशिश करते हैं।
केजरीवाल के पिछले एक वर्ष में कई रूप हमारे सामने आये, जिस राजनीति को दूषित कह कर आमजनमानस के मन में लोकतंत्र के प्रति घ्रणा पैदा कर रहे थे आज उसी राजनीति में प्रवेश कर चुके केजरीवाल की बातों में तानाशाही की स्पष्ट झलक देखी जा सकती है, ये चंद लोगों का संगठन कई हिस्सों में विभक्त हो चुका है और आज भी जो एक दूसरे के साथ होने का दम भरते हैं उनके ख़यालात आपस में भी मेल नहीं खाते। सोचना चाहिए जो लोग एक छोटे से संगठन को संगठित ना रख पायें हों वो इस राष्ट को भला कैसे एकता का पाठ पढ़ाएंगे उँगलियों पर गिने जा सकने वाले ये आन्दोलनकारी समूचे राष्ट की नीति और नियति का फैसला करना चाहते हैं, जिनकी खुद कोई दिशा और दशा नहीं वो भारत को एक नहीं दिशा देने का ख़्वाब जनता को दिखा रहें हैं और जनता है की वशीभूत हुयी जा रही है।
जिस लोकपाल बिल को अन्ना और उनकी टीम सर्वश्रेष्ट बताने की कोशिश कर रहे हैं हकीकत ये है की उस बिल को अन्ना हजारे ने आज तक पढ़ा ही नहीं, ये टीम अन्ना का नही बल्कि प्रशांत भूसन का लोकपाल बिल है, वो बिल जिसकी लड़ाई लड़ते 15 महीने बीते हैं उसमे खुद टीम अन्ना 18 से ज्यादा संसोधन कर चुकी है और आगे ना जाने कितने और संसोधन इसमें किये जायेंगे। वास्तविकता ये है की अन्ना हजारे और केजरीवाल खुद नहीं चाहते की लोकपाल बिल पास हो शायद यही वजह है की सरकार जब इनकी बातों को मान लेती हैं तो ये उस बिल को संसोधित कर नए प्रावधान जोड़ने लगते हैं ताकि सरकार से असहमति बनी रहे और ये जनसाधारण के मन में लोकतंत्र के खिलाफ जहर का रोपण करते रहें, सरकार इनकी जितनी भी मांगों को मान लेती है वो सब महत्वहीन हो जाती हैं और जो मांगे नहीं मानी जाती वही महत्वपूर्ण रहती हैं। अगर हकीकत में ये लोकपाल के पक्षधर होते तो सरकार इसे जिस भी स्वरूप में लाना चाहती थी, लाने देते जहाँ तक रही बात लोकपाल को सशक्त बनाने की तो सविधान संसोधन एक प्रक्रिया है जिसके तहत समय समय पर लोकपाल के अधिकारों की समीक्षा कर उसे कम या ज्यादा किया जा सकता था परन्तु इन्होने अपनी हठधर्मिता को सर्वोपरि माना और देश में लोकपाल कानून लागू नहीं होने दिया।
अन्ना का लोकपाल शक्तिओं का केन्द्रीकरण था अन्ना एक ऐसा सर्वशक्तिशाली लोकपाल देश को देना चाहते थे जो किसी भी नियंत्रण की परिधि में ना हो, जिसका कोई कुछ ना कर सके, जो किसी के प्रति उत्तरदायी ना हो और जिसके चयन में आमजनता की कोई भूमिका ना हो और वो देश का सर्वोच्च शक्तिकेंद्र बन जाये। शायद अन्ना देश को लोकपाल के नाम पर भस्मासुर देना चाहते थे या लोकपाल के नाम पर लोकशाही को तानाशाही में परिवर्तित करना चाहते थे । भारत का इतिहास साक्षी है की जब जब कोई सर्वशक्तिशाली हुआ है उसने अपनी शक्तियों का जमकर दुरूपयोग भी किया है।
देश का आम आदमी भ्रष्टाचार से त्रस्त है पर हम अपनी पीड़ा मिटाने के लिए एक नयी समस्या को भी तो नहीं अपना सकते, हम राजनेताओं से संतुष्ट नहीं हैं पर अपने इस असंतोष के कारण हम लोकतंत्र को भी तो कुर्बान नहीं कर सकते, हम जिस रास्ते को निदान का  रास्ता मान रहे हैं वो हमें एक ऐसे भंवर की ओर ले जायेगा जहाँ से लौट पाना कभी संभव नहीं होगा।
केजरीवाल ने नकारात्मकता की राजनीती शुरू की है ये संपूर्ण राष्ट को एक सुर में चोर बता रहें हैं, टीवी चैनल  पर रोज खुलासे करते हैं पर अपने पास उपलब्ध सबूतों को ना तो किसी जांच एजेंसी को देते हैं और ना ही न्यायालय जाते हैं जो प्रमाण है की केजरीवाल देश की संवैधानिक सरंचना पर भरोसा नहीं करते, केजरीवाल का मकसद भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना या भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाना नहीं बल्कि सनसनी फैलाकर सुर्ख़ियों में आना और आम जनता के मन में वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ नफरत पैदा करना है।
देश में प्रधानमंत्री का पद राष्ट की गरिमा, अतिविशिष्ठ्ता और सम्मान का प्रतीक होता है पर केजरीवाल अपनी मर्यादाओं को लांघते हुए अब बहोत आगे निकल चुके हैं, बात बात में प्रधानमंत्री पर निराधार आक्षेप लगाते रहते हैं जो केवल इस पद की गरिमा के खिलाफ नहीं बल्कि देश के मतदाता के आत्मसम्मान और निर्णय के भी खिलाफ है।
तय हमें करना है की क्या हम जो कुछ हमारे पास है उसे गढ़कर तैयार करना चाहते हैं या सब कुछ नष्ट कर तमाशबीन बनना चाहते हैं, ये देश किसी अन्ना या किसी केजरीवाल का नहीं बल्कि हम सभी के पूर्वजों का खून यहाँ की मिटटी में शमिल है, ये देश अगर अपनी नागरिकता के नाते हमें कुछ अधिकार देता है तो हमसे कुछ कर्तव्यों की भी अपेक्षा रखता है, जिस तरह से हम अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं उसी तरह से हमें अपने कर्तव्यों के प्रति भी संजीदा होना होगा, हम जिसे विकास  का मार्ग समझ रहे हैं वो सिर्फ और सिर्फ विनाश की ओर जाने वाला अंधकारों से सना हुआ रास्ता है, हमें अगर हमारे पूर्वजों ने आजाद भारत विरासत के तौर  पर दिया है तो हमारा प्राथमिक दायित्व है हमारी आने वाली पीढ़ी को इस आजादी को और बेहतर कर सौपना  ना की इसे समाप्त करना।
अन्ना ओर केजरीवाल देश का भविष्य नहीं बल्कि हम ओर आप इस देश का भविष्य हैं और हमें इस जिम्मेदारी को चौकन्ना होकर निभाना होगा वर्ना देश लोकतंत्र से भीडतंत्र और फिर भीडतंत्र से तानाशाहों के हाथ चला जायेगा, हम सिर्फ हाथ मलते रहेंगे और हमारी आने वाली पीढ़ी हमारे इस कृत्य पर शर्मिंदा और शर्मशार होगी।

Sunday, October 14, 2012

Arvind Kejarival and Indian Politics

भारतीय राजनीति में अरविन्द केजरीवाल 
 
अरविन्द केजरीवाल वर्तमान में सभी राजनीतिक दलों के लिए एक पहेली बने हुए हैं, कुछ दलों को लगता है की उनके इस आन्दोलन का लाभ उन्हें आने वाले चुनावों में मिलेगा तो कुछ दल अभी तक  भी तय नहीं कर पा रहें हैं की केजरीवाल के मामले में उनकी क्या भूमिका होनी चाहिए, नतीजतन देश के मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग राजनीती के इस भंवर को समझ नहीं पा रहा है और भ्रम और अनिर्णायक अवस्था का शिकार बना हुआ है।
कुछ माह पहले तक जब केजरीवाल, अन्ना और उनकी टीम केवल कांग्रेस का विरोध करती थी तब भाजपा समेत कई राजनीतिक दलों ने इसे भुनाने का प्रयास किया और आगामी चुनावों में कांग्रेस की हार को अपनी जीत के रूप में देखने लगे पर ये ख्वाब ज्यादा दिन तक कोई भी दल नहीं देख पाया क्योंकि केजरीवाल ने धीरे धीरे सभी राजनीतिक दलों को अपना शिकार बनाना शुरू कर दिया और खुद एक नए  राजनीतिक दल के साथ देश के सामने खड़े हो गए।
केजरीवाल देश की नब्ज समझ चुके थे पर अन्ना हजारे और किरण बेदी को केजरीवाल को समझने में वक़्त लगा और जब तक केजरीवाल की अति महत्वाकांक्षा इनके समझ में आती तब तक केजरीवाल अन्ना के आन्दोलन, विचारधारा, और जनसमर्थन को सीढियां बना कर रौंदते हुए आगे निकल गए।
जिन राजनीतिक दलों ने अन्ना और केजरीवाल को कांग्रेस विरोधी समझ कर अपना  समर्थन दिया और उनके साथ खड़ी भीड़ को अपने वोटबैंक में परिवर्तित करने का ख्वाब देखकर जंतर मंतर तक पहुच गए उनके लिए केजरीवाल गले में फंसी एक हड्डी की तरह हो गए जिसे निगलना और उगलना दोनों अब उनके बस में नहीं।
वर्तमान परिद्रश्य में अब  देश के  नागरिक को तय करना होगा की क्या अब हमें ऐसे नेतृत्व की ही आवश्यकता है जो देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था,  संसदीय परंपरा,  न्यायायिक व्यवस्था जांच एजेंसियों कि निष्ठा, सबको  एक सिरे से अस्वीकार कर दे और एक ऐसे रामराज की परिकल्पना लोगों के ह्रदय में बसाने की कोशिश करे जो भगवान राम स्वयं भी नहीं कर पाए।
अनशन और आन्दोलन देश के नागरिक का अधिकार है पर जिस अधिकार को पाने का हम पुरजोर प्रयास कर रहे हैं उसी देश की नागरिकता हमसे कुछ कर्तव्यों की भी अपेक्षा रखती है मसलन केजरीवाल को  हमेशा याद रखना चाहिए की उनकी अतिमहत्वाकांक्षा कही अन्तर्राष्टीय परिद्रश्य में  भारत की शाख और गरिमा को तो धूमिल नहीं कर रही है,  उन्हें  ध्यान रखना चाहिए की कहीं वो सही मुद्दों को गलत जगह तो नहीं उठाने का प्रयास कर रहे हैं, उन्हें ध्यान रखना चाहिए की जिन जांच एजेंसियों को वो नकारा मान रहे हैं उन्होंने ही इसी सत्तारूढ़ कांग्रेस के कई मंत्रियों को जेल जाने के लिए विवश किया है।
टीम अन्ना सरकार के खिलाफ जिस अविश्वास की  नीव पर अस्तित्व में आई उसी अविश्वास का खुद शिकार हो गयी और कई टुकड़ों में विभक्त टीम अन्ना आज अस्तित्व में नहीं है, जो अन्ना देश को एक सशक्त लोकपाल देने आये थे वो एक अदूरदर्शी केजरीवाल देकर वापस लौट गए,  केजरीवाल जिस संसद को अन्ना को साक्षी बनाकर कोसते आये आज उसी संसद में जाने की बाटजोह रहे हैं,  जो भाजपा कांग्रेस विरोधी अनशन और आंदोलनों की बैसाखी के सहारे संसद में बैठना चाहती थी उस भाजपा को केजरीवाल ने दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल कर अलग कर दिया और खुद संसद की ओर नजरे जमाने लगे।
शायद ये राजनीति नहीं राजनीति का विकृत रूप है जब केजरीवाल संसद को चौराहे पर खडा करते थे तब भाजपा को ना तो संसदीय मर्यादा याद आई और न लोकतान्त्रिक तौर तरीकों से चुनी हुयी सरकार की आबरू की चिंता हुयी जो जनमत और निर्वाचन प्रणाली पर सीधा प्रहार था, किसी भी राजनीतिक दल का ध्यान इस ओर नहीं गया की इससे देश में अस्थिरता और असुरक्षा का वातावरण तैयार हो रहा है, अंतर्राष्टीय  स्तर  पर  भारत  की  शाख  गिर रही है लोग भ्रम का शिकार हो रहे हैं  जब की सभी राजनीतिक दल जानते थे की कोई भी केजरीवाल और अन्ना की आकांक्षाओं और आशाओं पर खरा नहीं उतर सकता क्योंकि उनकी मांग अनंत थी और हठ के स्वरुप में रोज बदलते रहने वाली थीं, ये लोग भीड़ दिखा कर भारत पर राज करना चाहते थे, केजरीवाल और अन्ना के लिए जो कुछ किया जाता वो सब महत्वहीन था जो करना संभव नहीं था बस वही महत्वपूर्ण था।
अब केजरीवाल सत्ता में  आयेंगे जहाँ केवल दो ही लोग होंगे एक केजरीवाल और दूसरा लोकपाल, क्योकि जिस न्यायायिक व्यवस्था, और प्रशासनिक व्यवस्था को ये मानते ही नहीं उसे भला कैसे अस्तित्व में रहने देंगे,हम लोकतंत्र से राजतन्त्र और फिर लोकशाही से तानाशाही तक पहुच जायेंगे फिर सरकारे मतदान से नहीं गुप्तदान से बना करेंगी और जनता जो आज तमाशबीन है कल तमाशा बन कर रह जाएगी।

Tuesday, May 11, 2010

सिर्फ पिता के लिए

पिता- पिता जीवन है संबल है शक्ति है,
पिता- पिता स्रष्टि के निर्माण कि अभिव्यक्ति है,
पिता- पिता उंगली पकडे बच्चे का सहारा है,
पिता- पिता कभी खट्टा कभी खारा है,
पिता- पिता पालन है पोषण है परिवार का अनुशाशन है,
पिता- पिता धौस से चलने वाला प्रेम का प्रशाशन है,
पिता- पिता रोटी है कपडा है मकान है,
पिता- पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है,
पिता- पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है,
पिता- पिता है तो बच्चों को इन्तजार है,
पिता- पिता से बच्चों के ढेर सारे सपने हैं,
पिता -पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं,
पिता- पिता से परिवार मे प्रतिपल राग है,
पिता- पिता से ही माँ कि बिंदी और सुहाग है,
पिता- पिता परमात्मा कि जगत के प्रति आसक्ति है,
पिता- पिता गृहस्थ आश्रम मे उच्च स्तिथि कि भक्ति है,
पिता- पिता अपनी इच्छाओं का हनन और परिवार कि पूर्ती है,
पिता- पिता रक्त निकले हुए संस्कारों कि मूर्ती है,
पिता- पिता एक जीवन को जीवन का दान है,
पिता- पिता दुनिया दिखाने का अहसान है,
पिता- पिता सुरक्षा है अगर सर पर हाथ है,
पिता- पिता नहीं है तो बचपन अनाथ है,
तो पिता से बड़ा तुम अपना नाम करो,
पिता का अपमान नहीं उन पर अभिमान करो,
क्योंकि माँ बाप कि कमी को कोई पाट नहीं सकता,
इश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता,
विश्व मे किसी भी देवता का सम्मान दूजा है,
माँ बाप कि सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है,
विश्व मे किसी भी तीर्थ कि यात्रायें व्यर्थ हैं,
यदि बेटे के होते हुए माता पिता असमर्थ हैं,
वो खुशनसीब हैं जिनके माँ बाप साथ होते हैं,
क्योंकि माँ बाप के आशीषों के हाथ नहीं हजारों हाथ होते हैं|

पूजा तुम्हारे लिए जिया कि तरफ से .... माँ का अहसास

माँ - माँ संवेदना है भावना है अहसास है,
माँ - माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है,
माँ - माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पालना है,
माँ - माँ मरुश्थल मे नदी या मीठा सा झरना है,
माँ - माँ लोरी है गीत है प्यारी सी थाप है,
माँ - माँ पूजा कि थाली है मंत्रो का जाप है,
माँ - माँ आँखों का सिसकता हुआ किनारा है,
माँ - माँ गालों पर पप्पी है ममता कि धारा है,
माँ - माँ झुलसते दिलों मे कोयल कि बोली है,
माँ - माँ मेहँदी है कुमकुम है सिन्दूर है रोली है,
माँ - माँ कलम है दवाद है स्याही है,
माँ - माँ परमात्मा कि स्वयं एक गवाही है,
माँ - माँ त्याग है तपस्या है सेवा है,
माँ - माँ फूँक से ठंडा किया हुआ एक कलेवा है,
माँ - माँ अनुष्ठान है साधना है जीवन का हवन है,
माँ - माँ जिन्दगी के मोहल्ले मे आत्मा का भवन है,
माँ - माँ चूड़ी वाले हाथों के मजबूत कन्धों का नाम है,
माँ - माँ काशी है काबा है और चारो धाम है,
माँ - माँ चिंता है याद है हिचकी है,
माँ - माँ बच्चे कि चोट पर सिसकी है,
माँ - माँ चूल्हा धुआं रोटी और हाथों का छाला है,
माँ - माँ जिन्दगी कि कडवाहट मे अमृत का प्याला है,
माँ - माँ प्रथ्वी है जगत है धुरी है,
माँ - माँ बिना इस स्रष्टि कि कल्पना अधूरी है,
तो माँ कि ये कथा अनादी है,
ये अध्याय नहीं है,
और माँ का जीवन मे कोई पर्याय नहीं है,
माँ का महत्वा दुनिया मे कम हो नहीं सकता,
माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता|

कभी खुद से मिलूँगा तो पूछूँगा जरूर

जिन्दगी कि आपा धापी मे ना जाने क्या क्या खोया मैंने पर अफ़सोस सिर्फ खुद को खोने का है, आज अचानक ही तबियत हुई कि चलो खुद से कुछ बात कि जाये पर देख कर हैरान रह गया कि मैं खुद से कितना दूर चूका हूँ, यहाँ अगर अभय है तो खुद के लिए शिकायतों कि एक पोथी या फिर अनसुलझी सी एक पहेली और गर कभी किसी ने कोशिश कि सुलझाने कि तो उलझनों के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा | जब जिन्दगी कि शुरुआत एक कोरे कागज कि तरह कि तो लगा जैसे सब कुछ कितना आसान है पर आज यही कागज किसी उजले कफ़न मे लगे खून के दाग कि मानिंद कहानिया कहता है, जाना कहाँ था और कहाँ गए....शायद तरक्की इसी को कहते हैं, जब बेजुबान जानवरों को शाम होते ही घरोंदो कि ओर जाता देखता हूँ तो तरस आता है अपने वजूद पर जो चंद पैसों, चंद जरूरतों, और चंद साधनों के लिए अपनों से दूर उम्र के चढ़ाव का उतार देख रहा है, कल ये भी नहीं होगा और वो भी, फिर अफ़सोस शायद इससे ज्यादा उसका होगा पर क्या करें दौड़ना तो इसी भीड़ में है गर ठहर गए तो लोग कुचल देंगे |
छोटी सी जिन्दगी, कुछ लोग ज्यादा करीब है और कुछ आस्तीनों मे सांप कि तरह लिपटे हैं पर जो अपने थे उनका कोई पता ठिकाना नहीं शायद उन्हें भी भगवान ने मेरी ही तरह दुलार रखा है, बहोत से लोगों का तो अब नाम भी सिर्फ उनकी आखरी खबर कि तरह मिलता है, मन करता है कि काश वो एक दिन और जिन्दा होता तो पूरा दिन उसके साथ गुजारता पर फिर याद आता कि कितने सारे लोग जिन्दा हैं जिनके साथ गुजारने के लिए एक पल भी नहीं, आज कल लोग लोगों कि मौत के बहाने एक दूसरे से मिल लिया करते हैं वरना इस तरक्की के दौर मे जिन्दा लोगों के घर जाने कि फुर्सत कहाँ|
अपने पराये सब कुछ जनता था पर अब परिभाषा बदल गयी, मुझे जिनकी जरुरत है वो मेरे अपने रह गए और जिन्हें मेरी जरुरत है मैं उनका अपना हो गया बाकि सब पराये हैं, रिश्ते रस्म बन गए और रास्तों मे मिले बेगाने घेर कर चल पड़े, जिन्दगी किराये के मकान कि तरह अलग अलग गलियों और अलग अलग चौखटों मे गुजार दी, आज जहाँ खड़ा हूँ यहाँ रोज सुबह से शाम तक रिश्तों का बाज़ार लगता है, बड़े बड़े रिश्ते ख़रीदे जाते हैं और अच्छे अच्छे रिश्तों को बिकते देखता हूँ, कई बार मन को ये सोच कर तसल्ली भी होती है कि अच्छा हुआ मैं अपने रिश्तों को साथ नहीं लाया वरना शायद उन्हें भी यहाँ के दस्तूर के आगे मजबूर होकर नीलाम होना होता|
हर कोई अपनों से दुखी है और हो भी क्यों न परायों के पास इतनी फुर्सत कहाँ कि वो आपको दुखी करने मे अपना कीमती वक़्त जाया करें क्या उनके अपने नहीं, वो वहां व्यस्त है, आज के दौर में गर कोई आपका अपना आपको दुखी न करे तो एक बार सोचना जरूर, हो सकता है वो आपका अपना हो ही नहीं या फिर आप तो उसे अपना समझ कर दुखी कर रहे हो पर वो आपको अपना समझता ही न हो, ऐसे लोग जो जिन्दगी मे दुःख भी न दे सकें भला उनसे और किस चीज कि उम्मीद रखी जाये, कहते हैं दुःख के बाद सुख मिलता है पर जिनसे आज तक दुःख नहीं मिला भला सुख कैसे मिलेगा|
जाने वो कैसे लोग थे जिन्हें भगवान् मिल गए हम तो एक अच्छे इंसान को भी तरसते हैं .... गर कभी कोई मिला भी तो मैं परख नहीं पाया और देर हो गयी, आखों के सामने से वो कब ओझल हो गया पता ही नहीं चला और जब पता चला तब आँख मलने के सिवा कुछ शेष न था, हो सकता है मेरी जिन्दगी मे किसी धुंधले द्रश्य कि तरह जो चंद तस्वीरें हैं वास्तव मे वो अस्तित्वा मे ही न हों पर फिर भी इन जगमगाती रातों मे भी वो धुंधलापन जीने का सहारा बनता है, मैंने उन्हें खोया मुझे गम जरूर है पर तसल्ली भी कि जो मेरा नहीं था वो आज मेरा नहीं है पर वो खुद को क्या कह कर बहलाते होंगे जिन्होंने मुझे खोया और मैं उनके सिवा आज भी किसी और का नहीं बन पाया | निभाने से भी डर लगता और आजमाने से भी, कही जिन्हें अपना समझने का भरम पाल कर ही खुस हो लेता हूँ वो भी न टूट जाये|

Saturday, July 25, 2009

तेरे लिए दुखी हूँ, तेरी वजह से नही.....

एक पल के लिए किसी पर नज़र जाना और फिर हर पल उसी नज़र के लिए तरसना, कैसा रिश्ता है ये तो नही मालूम पर पिछले जन्म की कोई अधूरी दास्तान या फिर अगले जन्म का अहसास कराता हुआ तेरा वजूद न जाने क्यों जीने के लिए मजबूर करता है। जिंदगी कई हिस्सों मे बाटी थी हमने पर अब एक हिस्सा छोड़ सारा आपके नाम कर दिया जो आपके पास है वो शायद इसलिए की जिन्दगी की वीरान राहों मे कभी आपको अकेलेपन का अहसास न हो और जो मेरे पास है वो शायद दुनिया मे किसी मासूम बच्चे की मुस्कराहट सा अपना अस्तित्व खोजता है । अपने भीतर मैंने कई बार झांक कर देखा तो जरूर, पर कभी वो जीने की चाह नही नजर आई जो आज महसूस होती है । पहले मौत से भी डर नही लगता था और अब जिन्दगी से भी घबराता हूँ , पहले किसी का नही था और अब कहीं का नही हूँ, एक साथ की चाह ने तनहाइयों का अहसास करा रखा है, कभी ये सोचा भी नही था की जिसे अपने लिए जीने में परहेज हो वो किसी और के लिए ग्रहणों का वास्ता लेकर जिन्दगी खोजने निकले । बाज़ार में बिकना हमारी आदत थी पर नीलाम पहली बार हुए, ख़ुद की कीमत देकर हम तुम्हे खुदा बनाने निकले हैं। दिल मेरे पास भी है ये नाना नानी के किस्से और कहानी सी बात होती थी पर तुमने मेरी हसरतों की दुनिया बसाकर इसके अस्तित्व को बल दिया है। जब कभी लहुलुहान नज़रें आइना देखती हैं तो एक अजीब सा तूफ़ान नजर आता है आँखों मे, और उस तूफ़ान मे घिरा अकेला अभय एक आवाज दे रहा होता है जिसे कोई शायद कभी न समझ सके या सुन सके। ऐसा नही की ये अक्सर होता रहा है जिन्दगी में, पर जब हुआ समझ से परे था । तुम्हे समझाना या समझना मेरे मन और मस्तिस्क दोनों के दायरे से बाहर की बात है पर हम ने जिदगी भर अपने दिल से लडाई की है, इसलिए आदत नही फितरत सी हो चुकी है ख़ुद को बेंच कर दर्द खरीदने की पर शायद इस बार सौदा जरा मंहगा पड़ा।

Monday, April 20, 2009

कमजोर प्रधानमंत्री बनाम लौहपुरुष. . . . . .जनता क्यों कुछ नही जानती?

दो लोग देश के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठने की जुगत में इस कदर लगे हुए हैं की एक दूसरे पर अलोकतांत्रिक शब्दों का प्रयोग करना इनकी आदत बन चुकी है , संयम और सादगी तो जैसे किताबों की बात, एक को कठपुतली कहा जाता है तो दूसरे को आतंकवादियों को रिहा करने का इल्जाम दिया जाता है , एक मात्र भाषा से परहेज रखतें हैं तो दूसरे जिन्ना की तारीफ़ में पीछे नही हटते, दोनों ही सच कहते हैं एक दूसरे के बारे में, अब जनता को सोचना चाहिए की किसकी गलतियों को माफ़ कर सत्ता सौपनी है।
बहोत से ख़राब लोगों में एक कम ख़राब को चुनना तो हमारी मजबूरी है ही, और जब हम मजबूर होकर कोई सरकार बनायेंगे तो वो मजबूत होगी की मजबूर सब जानते हैं।
जिस देश में धर्म और मजहब के नाम पर चुनाव जीतने की परम्परा हो वहां अगर हर दल किसी एक जाती, धर्म या मजहब का सरंक्षक बनने की कोशिश करता है या खुले शब्दों में कहें की धर्म की ठेकेदारी करता है तो क्या हर्ज़ है क्योंकि ये आदत तो हमनें ही डाली है न ।
एक हिन्दुओं के ठेकेदार हैं तो दूसरे मुस्लिम लोगों के हितों की रक्षा करने का दम भरते है, एक दलितों के नाम पर सत्ता सुख भोगने की चेष्टा रखते हैं तो कुछ कभी इस दल में कभी उस दल में कभी दल दल में नजर आते हैं, ये है मेरे देश के लोतंत्र की तस्वीर।
जागो अभी भी वक़्त है, इससे पहले की पानी सर के ऊपर से गुजरने लगे, अच्छे लोगों को चुन कर देश की बागडोर सौप दो।

Sunday, April 19, 2009

नेताओं पर जूते और चप्पल फेकना. . . . कितना जायज?

अमेरिकी राष्टपति से शुरुआत हुई और परम्परा आ पहुँची हमारी धरती तक, कभी लगा आक्रोश जाहिर किया तो कभी लगा जैसे किसी ने चाल चल कर इस हरकत को अंजाम दिया, पर यदि ये आक्रोश था तो क्या बस इतनी सी आग लगी थी सीने में की एक जूता फेंका और बुझ गई और अगर अब ठान लिया है की अपनी आवाज़ को बुलंद करेंगे और इस देश की साख को चूना लगाने वाले लोगों को देंगे तो भी क्या इतनी सी सज़ा ?
नेताओं के प्रति गुस्सा, क्रोध और आक्रोश तो लगभग हर किसी के सीने में है पर जूता चला कर आप सिर्फ़ अपनी मानसिक विकृति का परिचय दे सकते हो या फ़िर थोडी सी सुर्खियों में जगह पा सकते हो लेकिन आपका ये मानसिक दिवालियापन न तो आप के लिए अच्छा है और न ही इस देश के लिए ।
अगर वास्तव में है जज्बा कुछ कर दिखाने का तो लोकतान्त्रिक परम्परा को संजीवनी दीजिये और अपने आस पास के लोगों को जाग्रत करिए की ऐसे लोगों का चुनाव में विरोध करें और अच्छे लोगों को चुन कर देश की बागडोर सौपें, आज भी हमारे देश का शहरी आदमी मतदान में हिस्सा नही लेना चाहता और फिर कहता है की ये देश को क्या हो गया, मेरा मानना है की देश को इस मुकाम तक ले जाने में जितना राजनेताओं का हाथ है उससे कही ज्यादा उन लोगों का है जिन्होंने वोट नही डाला और ग़लत आदमी संसद तक पहुँच गया ।
वृद्ध कहते है अब हमें क्या लेना देना हमारी तो कट गई, जवान को मोबाइल से फुर्सत नही और बच्चों को मतदान का अधिकार नही, पचास फीसदी लोगों के मतदान से जो सरकारें बनेगी वो कमजोर भी होंगी और कोई जरुरी नही की जो लोग उसका हिस्सा बने वो उस योग्य भी हों की देश चला सकें।
इसलिए चप्पल और जूते पैरों मे पहने और घर से बहार निकल कर ऐसे लोगों की तलाश करें जो वोट नही डालते, उन्हें मतदान का महत्व बताएं ।

Wednesday, December 17, 2008

तेरे जाने की कशमकश|

तुम मेरे पास हो पर हर बार तुम्हारा दूर जाने का वादा करना और फिर रिश्तों को वहीँ लाकर खड़ा कर देना, शायद इम्तिहान है और मेरे

Monday, December 15, 2008

तेरे मासूम सवाल

शुरुआत हुयी तो जुबान नही चलती थी सिर्फ़ उँगलियों के इशारे पर जरुरत से ज्यादा माँ बाप दे दिया करते थे फिर ऊँगली के बाद कदम चलना चालू हुए और ख़ुद चीजों के पास जा उठाने की आदत पड़ी और उसके बाद जब से बोलना सीखा , पता नही चीखना और चिल्लाना कब अपने आप सीख गया, मांगना कम हुआ छीनने की आदत पड़ गई और उसके बाद भी है पूरा नही होता
पता नही कितना चाहिए और कब तक चाहिए, अब तो लोग आने वाली पीढियों का भी भण्डार में हिस्सा तय कर देते हैं और कुछ लोग की जिन्हें आने वाली पीढी छोडो आने वाले दिन के भोजन का ठिकाना नही, कितना अजीब है तकदीर का लेखा

Friday, December 12, 2008

मुद्दतें हो गई मुस्कुराये |

कुछ तो वक्त ने बदल दिया और कुछ हालत ऐसी हो गई की बदले बदले नज़र आने लगे, वरना पहले भी जिंदा तो थे ही जीना चाहता जरुर हूँ पर केवल मौत के आने तक , इससे पहले लोंगों की कोशिश है और इसके बाद मुझमे चाह नही, सौदा करता हूँ सुबह से शाम तक कभी बिकता हूँ कभी खरीदा जाता हूँ, एक आदत सी पड़ गई है इस बाज़ार में जा बैठने की .... न जाएँ तो जाएँ कहाँ
शुरुआत में सब कुछ था तो पैसा नही था और आज पैसा है तो उसके सिवा कुछ भी नही , अकेला हूँ पर ख़ुद को अकेला कहने से डरता हूँ, क्योंकि कई बार कोशिश की कि कुछ अपने हों, कोई अपना हो, लोग अपने बने भी मगर साथ छोड़ गए शहर में कोई लाश निकलती है तो एक पल के लिए सहम जाता हूँ की कही ये मेरी तो नही, कभी मुझे कोई देखे भीड़ में तनहा तनहा अलग नज़र आऊंगा, इतने सारे लोगों ने मुझे अकेला छोड़ा की अब सुबह से शाम तक अपना बोझ ढोता हुआ जी लेता हूँ
पहले बहोत कुछ ऐसा था जिसे पाना था और वही सब जिसे पाया, मेरी मजबूरियों की वजह बन गई, जरुरत तो पहले भी सिर्फ़ दो वक़्त के खाने की थी और आज भी, पर इस छोटी सी चाह ने पता नही कहाँ कहाँ घुटने टेके और कितना सौदा किया ख़ुद के साथ

Friday, December 5, 2008

अब मै चुप रहूँगा

मैंने जब सोचा की आवाज उठाउंगा तो पता नही कितने नाजुक रिस्तों ने मुझे खामोश होने के लिए मजबूर किया, मैं जिसने देश की असली तस्वीर दिखाने की कोशिश की तो उसे रोक दिया गया क्योंकि शायद अपनों को ये डर था की कहीं मैं खो न जाऊँ, मुझे मालूम है एक एक शहादत की हकीक़त, और हर बन्दे का खून मां के खून का हवाला देता है बात सिर्फ़ मुंबई की नही है पुरे हिंदुस्तान , हर शहर, हर मोहल्ले, हर घर और हर परिवार की है, मैं अदना हूँ मगर हिन्दुस्तान की संवेदना हूँ ब्लास्ट के वक्त मैं किस राज्य में था इससे फर्क नही पड़ता, फर्क ये पड़ता है मैं अब तक जिन्दा क्यों हूँ , मैं एक आम आदमी हूँ लेकिन मेरी मां, मेरी बेटी, मेरी पत्नी, मेरे पिता और मेरा पड़ोसी सब इस आतंकवाद की आग में जले हैं आज मैं सो जाऊं तो मेरे पास नींद नही है